कुलदीप सिंह राणा /देहरादून
घटनायें बता रही हैं कि उत्तराखंड में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा सेवाओं में अराजकता अब चरम पर पहुंच गयी है क्या पहाड़ क्या मैदान, सब जगह स्थितियां एक सी नजर आने लगी है और सरकार के निर्णयों को देख कर लगता है कि उसकी नजर में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स की लापरवाही से होने वाली मौत के लिये जिम्मेदारी के मायने भी भिन्न भिन्न है। घटनायें तो यही दर्शा रही है। उपचार के आभाव में चमोली जिले के बच्चे की मौत दूसरी तरफ दून मेडिकल कालेज में बच्चे के लिये उपचार के दौरान महिला की मौत, एक पर जाँच के आदेश दूसरे पर खामोशी। एक की मौत सोशल मीडिया से लेकर अख़बारों की सुर्खियां बनाती है तो सूबे के मुखिया तत्काल जाँच के आदेश देते हुये तुरंत 4 डॉक्टर्स को ससपेंड भी कर देते है वही महिला की मौत पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आती है।
मामला राजधानी देहरादून स्थित राजकीय दून मेडिकल कालेज से जुडा है। जहाँ गर्भधारण संबंधी समस्या के उपचार हेतु 24 जुलाई की शाम को एक महिला भर्ती करायी जाती है। जिसका दूसरे दिन 25 जुलाई की सुबह ऑपरेशन किया जाता है लेकिन ऑपरेशन के बाद महिला को वेंटीलेटर पर रखना पड़ता है जहाँ देर रात उसकी मृत्यु हो जाती है और अस्पताल से लेकर सत्ता के गलियारों तक मुर्दा हो चुकी व्यवस्थाओं में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। उपचार के लिये महिला के ऑपरेशन थिएटर से लेकर मृत घोषित किये जाने तक का सम्पूर्ण घटनाक्रम जिस प्रकार से घटित हुआ वह शंका उत्पन्न करने वाला है।हकीकत जानने के लिये जब दून अस्पताल जाकर जाँच पड़ताल की गयी तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। मृतक महिला टीबी की रोगी थी जिस कारण उसके फॉलोपियन में ट्यूब ब्लॉकेज हो गया था अब सवाल उठता है कि….
–अगर महिला को टीबी थी तो ऐसी स्थिति में ऑपरेशन क्यों किया गया? टीबी ट्रीटमेंट प्रोटोकाल के अनुसार ऑपरेशन टीबी ठीक होने के बाद ही किया जा सकता था। तो क्या महिला की टीबी ठीक हो गयी थी?
– फॉलोपियन ट्यूब में टीबी (क्षय रोग) के कारण होने वाले ब्लॉकेज के लिए ‘लैप्रोस्कोपिक सर्जरी’ का प्रयोग किया जाता है जिसमे एक छोटा सा कट लगा कर सर्जरी को अंजाम दिया जाता है।तो फिर ऑपरेशन के दौरान अत्याधिक रक्तश्राव क्यों होने लगा था?
क्योंकि दून अस्पताल के ब्लड बैंक से 3 यूनिट व अन्य ब्लडबैंक से अतिरिक्त ब्लड मंगवाया गया था ।
पड़ताल में यह भी पता चला कि ऑपरेशन थिएटर में महिला की बिगड़ती स्थिति को सँभालने के लिये फोन करके सर्जरी विभाग से जनरल सर्जन को भी बुलाया गया था।
–उक्त महिला को वेंटीलेटर पर क्यों रखा गया?
हालांकि कर्मचारी दबी जुबान में कह रहे है कि महिला की मृत्यु तो ऑपरेशन थिएटर में ही हो चुकी थी। दिन का समय था इस लिये किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिये मृतका के शरीर को वेंटीलेटर पर रख दिया गया और रात्रि के लगभग ढाई बजे महिला के मृत्यु की जानकारी उसके परिजनों को दी गयी।
यह सारे सवाल और चर्चायें स्पस्ट रूप से व्यक्ति और व्यवस्था की लापरवाही की ओर इशारा कर रही है यह सारे सवाल जिनके जवाब खोजे जाने आवश्यक थे। लेकिन चिकित्सा शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या किया यह भी आपको बताते हैं।
महिला की मौत के उक्त घटनाक्रम पर जब दून अस्पताल के मेडिकल सुप्रीटेंडेंट डॉ आरएस बिष्ट से फोन पर बात की गयी तो वह असहज हो गये,आप प्रिंसिपल से बात कर लीजिये कह कर उन्होंने अपना पल्ला झाड लिया। आपको बता दें कि अक्टूबर 2023 में दून अस्पताल में उपचार के दौरान हुई एक महिला मौत पर तत्कालीन एमएस ने नियमानुसार जाँच के लिये एक कमेटी बना दो दिन में जाँच पूरी कर अपनी रिपोर्ट प्रिंसिपल को सौंप दी थी। अब सवाल उठता है कि महिला की मौत के इस घटनाक्रम पर वर्तमान एमएस डॉ आरएस बिष्ट ने कोई जाँच कमेटी क्यों नहीं बनायी ?
प्रिंसिपल डॉ गीता जैन से फोन कर जब पूछा गया तो उनका कहना था कि ऑपरेशन के बाद तबियत बिगड़ने महिला को वेंटीलेटर पर रखना पड़ा, शाम तक ब्लड प्रेशर में सुधार भी दिखने लगा था लेकिन लंग्स में खून का थक्का जम जाने के कारण मरीज की मौत हो गयी।
निदेशक चिकित्सा शिक्षा, डॉ आशुतोष सयाना के पास भी कहने को ज्यादा कुछ नहीं था,उनका कहना था कि उन्होंने कालेज प्रशासन को नोटिस देकर उक्त संदर्भ में रिपोर्ट देने को कहा था रिपोर्ट अभी आयी नहीं है वह दोबारा रिमांडर भेजेंगे।
इसके बाद जब सचिव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा डॉ आर राजेश कुमार से इस प्रकरण पर बात की तो उनका कहना था कि दून अस्पताल के एमएस डॉ आर एस बिष्ट से इस प्रकरण की सम्पूर्ण रिपोर्ट देने को कहा है। हालांकि 10 दिन से ज्यादा समय बीत चुके है सचिव को रिपोर्ट कब मिलेगी ? स्पस्ट दिख रहा है सब एक दूसरे के ऊपर जिम्मेदारी डाल पल्ला झाड रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि उपचार के दौरान एक मरीज की मृत्यु हो जाती है लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती। यह कैसा सुशासन है?
