उत्तराखंड सरकार ने भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड में बिना बोर्ड के बैठाया अध्यक्ष

कुलदीप राणा /देहरादून

सत्ता में बैठे हुक्मरानो ने एक बार फिर कायदे कानून को ताक पर रख जो कारनामा अंजाम दिया है उसका खामियाजा रजिस्ट्रार भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड कार्यालय के साथ-साथ प्रदेश की आयुष व्यवस्था को भुगतना पड रहा है।
भारतीय चिकित्सा परिषद एक स्वायत्तशासी संस्था है जिसका संचालन सरकार द्वारा सयुंक्त प्रान्त (आयुर्वेदिक तथा यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति )अधिनियम 1939 के प्रविधानो के अधीन गठित बोर्ड द्वारा किया जाता है बोर्ड में एक अध्यक्ष और 13 अन्य सदस्य होते है। परिषद में बोर्ड का गठन सरकार द्वारा अधिनियम के भाग 02 के अंतर्गत धारा 3, 5 एवं 6 में दिये गये प्राविधान के अनुसार किया जाता है।
इसके अंतर्गत धारा 3 में स्पस्ट कहा गया है कि

अध्यक्ष का तात्पर्य बोर्ड के अध्यक्ष से है.
-धारा 5(1) बोर्ड में अध्यक्ष सहित निम्नलिखित सदस्य होंगे.
-धारा 6(1) एक अध्यक्ष जो राज्य सरकार द्वारा नाम निर्देशित किया जायेगा.
-धारा 6(2) पाँच सदस्य जो राज्य सरकार द्वारा नाम निर्देशित
किये जायेंगे.
शेष अन्य निर्वाचन के माध्यम से सदस्य बनाये जाते है।
अर्थात स्पस्ट है कि बिना बोर्ड के अध्यक्ष कि नियुक्ति विधिसंगत नहीं हो सकती है।


पहले तो 23 मार्च 2022 को उक्त तमाम कायदों को दरकिनार करते हुये बोर्ड सदस्य नामित किये बिना ही परिषद में बोर्ड अध्यक्ष के पद पर डॉ जे.एन.नौटियाल की ताजपोसी कर दी जाती है।


अक्सर देखा गया है कि जिसे सत्ता का संरक्षण प्राप्त हो वह अपनी कारगुजारियों से कभी बाज नहीं आता है। उसे सत्ताधीश की राजनितिक छवि की भी परवाह नहीं होती है ऐसा ही कुछ भारतीय चिकित्सा परिषद में भी देखने को मिला, अध्यक्ष बनने तत्काल बाद ही डॉ नौटीयाल ने अपने राजनितिक आकाओं की सरपरसती में भारतीय चिकित्सा परिषद के एक्ट की व्यवस्थाओं व वित्त एवं गोपान के निर्देशों को अपने जूते की नोक पर रखते हुये मंत्री परिषद में सूचिबद्ध दायित्वधारियों की भांति अपने लिये लाखों रूपये मानदेय -भत्ते, राजकीय वाहन,संवर्ती स्टॉफ आदि जारी करवा लिया,जिसका बोझ शासन के बजाये वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहे परिषद के ऊपर ही पड रहा है।
कुछ महीनों बाद सरकार की नींद टूटती है और वह बोर्ड सदस्यों की नियुक्ति करती है। इस दौरान अध्यक्ष रहते हुये डॉ नौटियाल द्वारा लिये गये निर्णय वैधानिकता के कटघरे में आ गये। लेकिन सरकार को कहाँ फर्क पड़ने वाला था।


23मार्च 2025 को अध्यक्ष पद डॉ नौटियाल का कार्यकाल पूर्ण होने के साथ ही बोर्ड भी भंग हो गया।लेकिन 08 दिन बाद 1 अप्रैल को सरकार अचानक डॉ नौटियाल को अग्रिम आदेशों तक अध्यक्ष पद पर बने रहने का आदेश जारी कर देती है आश्चर्य की बात यह है कि इस बार भी बोर्ड सदस्यों को लेकर कोई निर्देश जारी नहीं करती है।
अधिनियम के भाग 2 की धारा 3 में स्पस्ट लिखा है कि अध्यक्ष का तात्पर्य बोर्ड के अध्यक्ष से है अकेले अध्यक्ष के पास कोई शक्तियाँ नहीं है अर्थात बोर्ड के 5 सदस्यों को नामित किये बिना सरकार अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं कर सकती है।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी की नेत्री विमला नौटियाल के पति डॉ नौटियाल को अध्यक्ष नियुक्त करने के मामले में राज्य सरकार द्वारा सारे नियम अधिनियम ताक पर रख दिये जाते है।
अब सवाल यह उठता है कि जब अध्यक्ष की सारी शक्तियां बोर्ड में निहित है तो बिना बोर्ड के अध्यक्ष के पद पर डॉ नौटियाल की नियुक्ति कितनी विधि संगत है। बिना बोर्ड के न तो वे परिषद में कोई निर्णय भी नहीं ले सकते है तो क्या सरकार ने लाखो रूपये मानदेय भत्ते व वाहन आदि पर जनता की गाढ़ी कमाई लुटाने के लिये डॉ नौटियाल को अध्यक्ष बनाया है?

क्या पुष्कर सिंह धामी जो सूबे के मुख्यमंत्री साथ ही आयुष मंत्री भी है को यह जानकारी है कि उनके नाक के नीचे उनके विभागों में क्या चल रहा है।उनकी यह दरियादिली राज्य की जनता की जेब पर कितनी भारी पड रही है,जबकि सरकार के पास नियंत्रक बैठाये जाने का न्यायसंगत विकल्प मौजूद है!