- धामी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर सवाल, डॉ. जे. एन. नौटियाल की नियुक्ति से उठा विवाद
- रिकवरी नोटिस जारी होने के आठ दिन बाद ही अध्यक्ष पद पर नियुक्ति क्यों की गई?
- क्या नियुक्ति से पहले लंबित विभागीय मामलों का परीक्षण किया गया?
- क्या परिषद के बोर्ड का गठन अधिनियम के अनुरूप किया गया?
- यदि वित्तीय अनियमितताओं को लेकर विभाग ने स्वयं की थी, तो बाद में स्थिति कैसे बदली?

Kuldeep Singh Rana /Dehradun /15-07-2026
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की भ्रष्टाचार के प्रति घोषित “जीरो टॉलरेंस” नीति आयुष विभाग के एक मामले में शुरुआत से ही सवालों के घेरे में है। उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, आयुष विभाग ने 10 जून 2026 को डॉ. जे. एन. नौटियाल को 20,75,958 रुपये की वसूली (रिकवरी) का नोटिस जारी किया। इसके मात्र आठ दिन बाद, 18 जून 2026 को मुख्यमंत्री ने उन्हें उत्तराखंड भारतीय चिकित्सा परिषद (बोर्ड) का अध्यक्ष नामित कर दिया।

इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध विभागीय स्तर पर वित्तीय वसूली की कार्रवाई चल रही हो, उसे उसी विभाग के अधीन आने वाली वैधानिक संस्था के शीर्ष पद पर नियुक्त करने का औचित्य क्या है।

विभिन्न विवादों के कारण डॉ. नौटियाल पहले भी रहे है चर्चा में
आयुष विभाग से सेवानिवृत चिकित्सा अधिकारी डॉ. नौटियाल पहले भी विभिन्न विवादों के कारण चर्चा में रहे हैं। आयुष विभाग में लंबित एक प्रकरण में आरोप है कि सेवानिवृति से मात्र 4वर्ष पूर्व 2017 में आयुर्वेद में एम.डी. अध्ययन अवकाश प्राप्त करने के लिए शासन को दिए गए शपथ-पत्र/ अनुबंध-पत्र में तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर इस प्रस्तुत किया गया जिससे अध्ययन अवकाश की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसी प्रकरण में विभाग ने 08 अप्रैल मार्च 2022 में डॉ नौटियाल को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

जिसका जवाब उन्होंने कभी नहीं दिया। हालांकि एक माह पूर्व कि 23मार्च 2022 को मुख्यमंत्री धामी उन्हें सयुंक्त प्रांत अधिनियम 1939 में दी गयीं व्यवस्था के विपरीत बिना बोर्ड गठित किये ही भारतीय चिकित्सा परिषद के बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।
वर्ष 2024 में दूसरी बार शासन द्वारा उक्त प्रकरण में कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है जिस पर मजबूरन डॉ नौटियाल को जवाब देना पड़ता है लेकिन वह अपना जवाब संतोष जनक नहीं दें पाते है।
जिसके बाद वर्ष 2026 में डॉ नौटीयाल के विरुद्ध रिकवरी नोटिस जारी किया है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय होना अभी शेष है।

मानदेय, वाहन, समवर्ती स्टाफ तथा अन्य सुविधाएं लिए जाने का मामला भी विवादों में
इसके अतिरिक्त, एक अन्य प्रकरण में डॉ नौटियाल द्वारा भारतीय चिकित्सा परिषद के अध्यक्ष रहते हुए परिषद से हजारों रूपये मानदेय, वाहन, समवर्ती स्टाफ तथा अन्य सुविधाएं लिए जाने का मामला भी विवादों में रहा है। जिस 27 जुलाई 2023 को आयुष विभाग के अपर सचिव द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि अध्यक्ष को दी जा रही उक्त सुविधाएं राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रदान की जा रही थीं, जो अधिनियम की व्यवस्था तथा वित्तीय नियमों के अनुरूप नहीं हैं। आदेश में इन सुविधाओं को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने के निर्देश दिए गए थे।
बोर्ड के गठन पर भी उठ रहे हैं प्रश्न
उत्तराखंड भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम की धारा 5 एवं धारा 6 के अनुसार बोर्ड में अध्यक्ष सहित राज्य सरकार द्वारा नामित सदस्य होते हैं। अधिनियम में अध्यक्ष का तात्पर्य बोर्ड के अध्यक्ष से है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि 23 मार्च 2022 को डॉ. नौटियाल को अध्यक्ष नियुक्त करते समय पहले बोर्ड का गठन नहीं किया गया। इसके बाद 23 मार्च 2025 को तीन वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद उन्हें 1 अप्रैल 2025 के आदेश से अग्रिम आदेशों तक पद पर बनाए रखा गया, जबकि बोर्ड के अन्य सदस्यों के संबंध में कोई समानांतर आदेश जारी नहीं हुआ।
राजनीतिक संरक्षण के आरोप
सरकारी और राजनीतिक हलकों में यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि डॉ. नौटियाल को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का व भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है,क्योंकि डॉ नौटियाल की पत्नी विमला नौटियाल उत्तरकाशी जनपद से भाजपा की नेत्री है जिसके कारण पिछले 5-6 वर्षों में कभी विभागीय कार्रवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी है। विभागीय दस्तावेज और आरोपों के बावजूद नियुक्ति से काफी हद तक इन आरोपों स्पस्ट करते है।
कुछ लोगों द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ निजि सचिव जो कि उत्तराकाशी जनपद से संबंध रखते है की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
यह पूरा प्रकरण अब केवल एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि सरकार की पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार के विरुद्ध घोषित नीति की विश्वसनीयता का विषय बन गया है।
