ग्रीन बूट्स की हुई पहचान: 30 वर्षों से एवरेस्ट की बर्फ में सोए भारतीय सैनिक दोरजे मोरुप

30 साल बाद जवान दोरजे मोरुप के शव को नसीब होगी घर की मिट्टी
  • 30 साल बाद जवान दोरजे मोरुप के शव को नसीब होगी घर की मिट्टी
  • एवरेस्ट की बर्फीली चोटियों पर फंस गए थे
  • अक्तूबर में परिवार को मिलेगा पार्थिव शरीर
  • पत्नी बोलीं-उन्हें एक बार देख लूं, फिर चैन से विदा हो जाऊंगी

Kuldeep Singh Rana /Dehradun /20-07-2026:
30 वर्षों से दुनिया जिस शव को वर्षों तक ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से जानती रही है डीएनए जाँच के बाद अब उसकी पहचान की जा चुकी है माउंट एवरेस्ट की बर्फीली ऊंचाइयों पर तीन दशक से बर्फ में दफन यह शख्स और कोई नहीं बल्कि भारतीय सैनिक लांस नायक दोरजे मोरुप है।
दोरजे मोरुप, शेवांग पाल्जोर और सूबेदार शेवांग समनला 1996 में तिब्बत के उत्तरी मार्ग से माउंट एवरेस्ट फतह करने निकली पहली भारतीय तीन सदस्यीय टीम का हिस्सा थे। 10 मई 1996 को शिखर के पास अचानक आए भीषण बर्फीले तूफान में तीनों सैनिक लापता हो गए थे। इतिहास में यह घटना 1996 एवरेस्ट त्रासदी के नाम से दर्ज है, जिसमें उस सीजन में 12 पर्वतारोहियों की मौत हुई थी।


ग्रीन बूट्स’ की पहचान…
ग्रीन बूट्स माउंट एवरेस्ट पर पर्वतारोहण के इतिहास का एक बेहद मार्मिक नाम है। यह किसी व्यक्ति का वास्तविक नाम नहीं, बल्कि उस पर्वतारोही के शव को दिया गया उपनाम है जो वर्षों तक एवरेस्ट के उत्तरी मार्ग पर लगभग 8,500 मीटर (27,890 फीट) की ऊंचाई पर एक छोटी चट्टानी गुफा में पड़ा रहा।
इस शव के पैरों में हरे रंग के पर्वतारोहण जूते थे, इसलिए पर्वतारोहियों ने इसे “ग्रीन बूट्स” कहना शुरू कर दिया। एवरेस्ट के उत्तरी मार्ग पर स्थित एक छोटी गुफा में पड़े इस शव के कारण यह स्थान “ग्रीन बूट्स केव” के नाम से प्रसिद्ध हो गया और शिखर की ओर बढ़ने वाले पर्वतारोहियों के लिए एक महत्वपूर्ण लैंडमार्क बन गया।
1996 में ब्रिटिश पर्वतारोही एवं फिल्म निर्माता मैट डिकिन्सन ने पहली बार बर्फ में जमे इस शव का वीडियो बनाया था। पैरों में हरे रंग के पर्वतारोहण जूते होने के कारण यह शव पूरी दुनिया में ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। लंबे समय तक इसे आईटीबीपी के हेड कांस्टेबल शेवांग पाल्जोर का शव माना जाता रहा, लेकिन हालिया डीएनए जांच ने इस भ्रम को समाप्त कर दिया।


डेथ जोन…
दोरजे का पार्थिव शरीर लगभग 8,000 मीटर की ऊंचाई पर पड़ा रहा, जिसे ‘डेथ जोन’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर सांस लेने के लिये उपलब्ध प्राकृतिक ऑक्सीजन का सामान्य स्तर से केवल एक-तिहाई ही होती है। इतनी ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर नहीं पहुंच पाते है इस लिये पर्वतारोहियों के शवों को नीचे लाना संभव नहीं हो पाता है इसे दुनिया के सबसे जोखिम भरे अभियानों में गिना जाता है। यही कारण है कि पर्वतारोहण के दौरान एवरेस्ट पर जान गंवा चुके 340 से अधिक पर्वतारोहियों के शव आज भी वहीं बर्फ में दफ़न हैं।


घर लौटने वाले है 1996 से एवरेस्ट की बर्फ में सोए दोरजे मोरुप
30 वर्षों से एवरेस्ट की बर्फ में सोए दोरजे मोरुप आखिरकार अपने घर लौटने वाले हैं। भारतीय सेना इस वर्ष अक्तूबर तक उनका पार्थिव शरीर लद्दाख स्थित उनके परिवार को सौंपने की तैयारी कर रही है। सेना ने अपने इस सैनिक को घर लाने की तैयारी शुरू कर दी है। दोरजे के परिवार उनकी 75 वर्षीय पत्नी कोनचोक यांगस्किट अपने पति के घर लौटने की राह देख रही है। वह अब सुन नहीं पाती है,और पति की पेंशन पर जीवन बिता रही हैं। उनका एक बेटा फुंतसोग, जो भारतीय सेना में हैं, ने उन्हें बताया कि पिता का पार्थिव शरीर घर लाया जाएगा, तो उन्होंने कागज पर अपनी अंतिम इच्छा लिखी—”बस एक बार उन्हें देख लूं, फिर चैन से विदा हो जाऊंगी।”


30 वर्षों बाद दोरजे मोरुप की घर वापसी केवल एक सैनिक के पार्थिव शरीर की वापसी नहीं, बल्कि उस परिवार की अधूरी प्रतीक्षा का अंत है जिसने तीन दशकों तक अपने प्रियजन की अंतिम विदाई का इंतजार किया।

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