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उत्तराखंड चुनाव -दलदल में राजनीतिक दल

कुलदीप एस राणा..

देहरादून: कोदा झंगोरा खायेंगे उत्तराखंड राज्य बनाएंगे” कभी उत्तराखंड राज्य आंदोलन को पोषित करता यह नारा आज उत्तराखंड में राजनीतिक महत्वकांक्षाओं में कहीं दब कर रह गया है। कोदा झंगोरा अब सत्ता की कुर्सी तक पहुचने का महत्वपूर्ण आधार बन गया है।

प्रतीकात्मक

उत्तराखंड में चुनावी महाभारत बहुत जोर शोर से आरम्भ हो गया है।राज्य में हर रोज कुछ न कुछ ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम हो रहा है जो राज्यवासीयों को निराश कर रहा है।राजनीति के मंच से लेकर नैपथ्य तक घट रही घटनायें संकेत दे रही है कि व्यग्तिगत महत्वकांक्षाओं की दौड़ में उत्तराखंड पिछड़ता जा रहा है।प्रत्यशियों की भीड़ और टिकट पाने के लिये धनबल का उपयोग यह सारे नकारात्मक लक्षण उत्तराखंड की राजनीति में आ गये है यह लक्षण उन बदलावों को दर्शाते है जिसमे राजनीति जो कभी सेवा का विषय हुआ करती थी जो अब धंधों, ठेकों ,सत्ता के लिये ख़रीद फरोख्त की राजनीति में बदल जाने से पैदा हुये है।वर्तमान में उत्तराखंड रोजाना ऐसी राजनीति से दो चार हो रहा है।

राजनीति में मिशन की जगह अब कमीशन ने ले ली है। टिकट पाने के लिए धनबल और दल बदल की खबरें अब राज्य के हर कोने से आने लगी है। टिकटों की बोली करोड़ों में लग रही है। जिसकी बोली जितनी ज्यादा टिकट उसके नाम। विधानसभा का रास्ता अब भी भले ही जनता के बीच से गुजरता हो लेकिन राह इतनी रपटीली हो गई है जहां धनबल के बिना मंजिल पर पहुचना शायद ही मुमकिन हो। राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को लेकर छोटे मोटे विद्रोह तो पहले भी हुआ करते थे। किंतु यह विद्रोह जिस प्रकार से चेन रियेक्शन में बदलते जा रहें है उसे उत्तराखंड के लिए कहीं से भी हितकारी नही कहा जा सकता है। कभी व्यक्तिगत तो कभी पारिवारिक हितों के लिये जिस प्रकार से प्रत्याशी दल बदले रहें। जो सुबह कांग्रेस में थे दोपहर तक भाजपाई हो गए उसके विरोध में भाजपाई कॉंग्रेस का दामन पकड़ने से भी गुरेज नही कर रहे है। दलों में अनुशासन के दावे खोखले साबित हो रहें है।बस किसी तरह टिकट मिल जाये।यह आतुरता यह विद्रोह जनता की सेवा के लिये तो कतई नही हो सकता है।

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