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क्या 2017 में काँग्रेस की हार का कलंक मिटा पाएंगे हरीश रावत

कुलदीप सिंह राणा

देहरादून

चुनाव प्रचार थमने में थोड़ा ही समय शेष है चुनावी समर में 2017 की निराशाजनक हार का बदला लेना को पूर्व सीएम हरीश रावत अपना पूरा जोर लगा चुके है। उक्त हार ने हरीश रावत को पूरे पांच साल बेचैन किये रखा है बेचैनी ऐसी कि 73 साल यह नेता हाथों में लाठी की जगह क्रिकेट का बल्ला थाम विपक्ष को चुनौती देता दिखायी दिया। 2017 की हार बाद खेमो में बटी काँग्रेस पूरी तरह से हरीश रावत के विरुद्ध आ खड़ी हुई थी। दो दो विधानसभाओ से मिली हार और कांग्रेस के 11 पर सिमट जाने की कडुवाहट हरीश रावत ने पूरे पांच वर्ष झेली है। किंतु इन पांच वर्षों में जहां पार्टी नेपथ्य में कहीं खो सी गयी थी वहीं हरीश रावत ने जनता के बीच जाकर अपने खोये जनाधार को पुनः हासिल करने में कोई कोर कसर नही छोड़ी। चाहे चाय की ठेली हो या पान की दुकान, समोसे तलने से लेकर सड़क किनारे राजमा चावल खाने की बात हो हरीश रावत ने हर वो प्रयास किया जिससे जनता से संवाद कायम किया जा सके।

जन मुद्दों को लेकर कांग्रेस कितने मुखर रही हो यह किसी से छुपा नही है किंतु हरीश रावत की आवाज जनता में शायद ही किसी के कानों तक न पहुँची हो।

गणेश गोदियाल एवं हरीश रावत(फ़ाइल फोटो)

क्या पार्टी के भीतर क्या पार्टी के बाहर हरीश रावत हर मोर्चे पर बेहद सतर्कता एवं चतुराई से अपनी राजनीतिक चाल चलते दिखायी दिये। जिसका प्रमाण पहले गणेश गोदियाल को उत्तराखंड प्रदेश काँग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाना फिर यशपाल आर्य और उनके बेटे की कांग्रेस में वापसी, तमाम अंतर्विरोध के कारण भाजपा से निष्कासित हरक सिंह रावत को, अपनी शर्तों पर पार्टी में शामिल करवाना, रणजीत रावत को रामनगर सीट से बाहर कर देना यह हरीश रावत का कूटनीतिक कौशल का ही परिणाम है कि विरोधी भी उनके सामने आवाज ऊंची करने से  घबराते है। उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी देवेंद्र यादव के पर कतरने से लेकर अपने करीबियों को टिकट दिलवाने में हरीश रावत हर कदम पर अपने विरोधियों को मात देते दिखायी दिये।

लोक वाद्ययंत्र के साथ हरीश रावत

ट्वीटर हो फेसबुक पोस्ट,टीवी हो या अखवार मीडिया हरीश रावत का हर बयान सुर्खियों में रहा। अनेक अवसरों पर वह अपनी इन्ही चालों से प्रतिद्वंद्वी से लेकर हाई कमान तक को पटखनी देते दिखे। वर्ष पर्यन्त चुनाव न लड़ने की बात करने वाले हरीश रावत को आखिरकार पार्टी हाई कमान के सामने झुकना ही पड़ा। उसमे भी पहले रामनगर में अपने विरोधी रणजीत रावत को बाहर का रास्ता दिखाया फिर भितरघात से बचने के लिए चुनाव लड़ने लालकुआँ चले गये हालांकि यहां भी  चुनौतियां कम नही है भाजपा प्रत्याशी मोहन बिष्ट एक मजबूत प्रतिद्वंदी साबित हो रहें है। वहीं निर्दलीयों ने भी लालकुआं सीट पर चुनाव को रोचक बना दिया है।

स्थानीय उत्पाद की जानकारी लेते हरीश रावत(फ़ाइल फिट)

हरीश रावत ने जनता के बीच मजबूत पैठ बनायी है। आज जनता उन्हें उत्तराखंड के नेता के रूप में देख रही है।जो गाड़ गधेरों की बात करता है जो मंडुवा, झंगोरा, आम, खीरा, ककड़ी जैसे पहाड़ी उत्पादों को बाजार देने हेतु सँघर्ष करता दिखायी देता है। उसे स्थानीय लोक कला एवं संस्कृति की चिंता है।

राजनीतिक विश्लेषकों एवं स्वतंत्र पत्रकारों का कहना है चुनाव में भाजपा के लिए चुनौती कांग्रेस नही बल्कि हरीश रावत है। क्योंकि अगर आज कांग्रेस भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में पहुची है तो उसके पीछे हरीश रावत की ही मेहनत है। वहां भाजपा संगठनात्मक रूप से तो बेहद मजबूत है किंतु 3-3 मुख्यमंत्री बदल कर वह जनता के समक्ष नेतृत्व को लेकर कटघरे में जरूर है। हालांकि पुष्कर धामी के सीएम बनने के बाद से परिदृश्य कुछ बदला जरूर है।सवाल यह उठता है कि क्या हरीश रावत  भाजपा से अपनी 2017 की हार का बदला ले पाएंगे। क्या काँग्रेस सत्ता में वापसी कर पायेगी।क्या हरीश रावत अपना कलंक धो पाएंगे?

क्योंकि जनता के सामने एक तरफ युवा एवं ऊर्जावान नेतृत्व पुष्कर धामी है दूसरी तरफ अनुभवि नेता हरीश रावत!

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