विशेष विश्लेषण /शब्द संसद
बेलगावी (कर्नाटक) अंगोल में स्थित संत मीरा स्कूल शुक्रवार 10 जुलाई को शुरू हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक का समापन हो चुका है प्रांत प्रचारक संघ की संरचना में शाखा स्तर से लेकर अखिल भारतीय केंद्रीय नेतृत्व के मध्य सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक कड़ियों में माने जाते हैं। वह अपने-अपने प्रांतों में संघ के विस्तार के लिये कार्यकर्त्ताओं का निर्माण,उनके प्रशिक्षण से लेकर सेवा गतिविधियों और सामाजिक संपर्क का नेतृत्व करते हैं। ऐसे में देशभर के विभिन्न प्रांतो व संगठनों से आए प्रचारकों की यह बैठक जमीनी अनुभवों और भविष्य की दिशा तय करने हेतु सूचनाओं के आदान प्रदान और चर्चा का प्रमुख मंच होती है। उक्त बैठक में जो निर्णय लिये जाते है प्रांत प्रचारक द्वारा वर्ष पर्यन्त स्वयंसेवक के माध्यम से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनका अनुपालन सुनिश्चित किया जाता है।
संघ में किये जा रहें संगठनात्मक बदलाव के दृष्टिगत यह आख़िरी प्रांत प्रचारक बैठक मानी जा रही है। नये वर्ष से संघ में प्रांत की जगह संभाग व्यवस्था शुरू हो जायेगी। बेलगावी में चल रही अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक ऐसे समय हो रही है,जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में है और कई महत्वपूर्ण नीतिगत तथा सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही है।वहीं देश में सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण बहसें चल रही हैं।
अतः संघ की उक्त बैठक को केवल एक नियमित संगठनात्मक बैठक मानना इसकी गंभीरता और व्यापकता को कम करके आंकना होगा। संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित इस बैठक पर केवल स्वयंसेवकों की ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों, विश्लेषकों और नौकरशाही की भी नजर है।
शताब्दी वर्ष का लक्ष्य
संघ 2025-26,शताब्दी वर्ष को मात्र उत्सव के रूप में नहीं देख रहा है बल्कि समाज के प्रत्येक स्तर तक संगठन विस्तार के अभियान के रूप में देख रहा है। शताब्दी वर्ष में संघ की शाखाओं की संख्या बढ़ाने, युवाओं तक पहुंच बनाने, परिवार संपर्क अभियान चलाने और सेवा कार्यों को गति देने पर विशेष बल दिया गया। संघ शताब्दी वर्ष के शेष कार्यक्रम आगामी विजयादशमी तक चलेंगे। बेलगावी की बैठक में इन अभियानों की समीक्षा और अगले चरण की कार्ययोजना पर चर्चा स्वाभाविक है।
सामाजिक मुद्दों पर रणनीति
हालांकि, संघ द्वारा अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया जाता है, इसलिए किसी विशेष विषय या निर्णय का दावा करना उचित नहीं होगा। वर्तमान समय में देश में अयोध्या राम मंदिर प्रकरण, सांस्कृतिक पहचान,जातीय जनगणना, सामाजिक समरसता, जनसंख्या, शिक्षा और परिवार व्यवस्था जैसे विषयों के साथ साथ संघठन की ढांचा गत व्यवस्था चर्चा के केंद्र में हैं। संघ समय समय पर इन विषयों पर अपने विचार सार्वजनिक करता रहा है। इसलिए माना जा रहा है कि संगठन के सामाजिक अभियानों की दिशा को लेकर भी इन मुद्दों पर विचार-विमर्श हो सकता है।
संघ का चुनावों पर प्रभाव
संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताता है और कभी चुनाव भी नहीं लड़ता, लेकिन कार्यकर्ता आधारित
संगठन के व्यापक सामाजिक नेटवर्क व उसकी गतिविधियों का राजनीतिक वातावरण पर प्रभाव हमेशा दिखायी दिया है। वर्तमान में केंद्र एवं अधिकांश राज्यों में संघ के राजनितिक शाखा भारतीय जनता पार्टी की सरकारें है। इस कारण राजनितिक विश्लेषकों उक्त बैठक को आगामी वर्ष में उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य चार राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में भी देखा जा रहा हैं।
संघ और सरकार
यद्यपि संघ की इस बैठक का उद्देश्य संगठनात्मक चिंतन होता है लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि सरकार और संघ के बीच समन्वय किन मुद्दों पर होता है। संघ द्वारा रजनीति से जुड़े राष्ट्रीय महत्व के सामाजिक और नीतिगत विषयों पर विचार-विमर्श भविष्य में देश के सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है। बैठक के बाद यदि संघ की ओर से कोई औपचारिक वक्तव्य या दिशा-निर्देश जारी होते हैं, तो उनसे उसकी प्राथमिकताएं और स्पष्ट होंगी।
दक्षिणी राज्यों पर विशेष ध्यान
संघ द्वारा बेलगावी,कर्नाटक को बैठक स्थल चुने जाने को भी राजनितिक विश्लेषक रणनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं। कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा से जुड़े इस संवेदनशील क्षेत्र में बैठक का आयोजन दक्षिण भारत में संगठन की सक्रियता के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में संघ ने दक्षिणी राज्यों में शाखा विस्तार, सेवा परियोजनाओं और सामाजिक संवाद को बढ़ाने पर विशेष फोकस किया है। ऐसे में इस क्षेत्र में बैठक आयोजित करना संघ के संगठनात्मक संदेश का भी हिस्सा माना जा सकता है।
बेलगावी में संघ की यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां लिए गए संगठनात्मक निर्णय न केवल शाखाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि आने वाले वर्षों में संघ के सामाजिक अभियानों, जनसंपर्क और वैचारिक संवाद की दिशा भी तय करते हैं। यही कारण है कि इस बैठक पर देश की राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से विशेष निगाह बनी हुई है।
देखना यह है कि क्या संघ शताब्दी वर्ष के लिए कोई नया राष्ट्रीय अभियान घोषित करता है, क्या सामाजिक समरसता और संपर्क कार्यक्रमों को नया स्वरूप दिया जाता है, और क्या समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दों पर कोई औपचारिक संदेश सामने आता है।
बेलगावी: आरएसएस की आख़िरी अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक के राजनीतिक और वैचारिक मायने
