युवा भारत के इतिहास के सत्य को जाने और उस दिशा में शोध एवं अध्ययन करें-जे नंद कुमार 

देहरादून

देहरादून रेसकोर्स स्थित ट्रांजित हॉस्टल मे प्रज्ञा प्रवाह की उत्तराखंड इकाई देवभूमि विचारमंच द्वारा रविवार 8जून को प्रातः एक परिचर्चा बैठक आयोजित की गयी।

प्रज्ञा प्रवाह एक अखिल भारतीय मंच है जो भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत की गहरी समझ और प्रशंसा को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। यह मंच भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं जिसमें दर्शन, कला, साहित्य, अध्यात्म और सामाजिक विज्ञान शामिल हैं, से जुड़ा हुआ है और इसका उद्देश्य विद्वानों, बुद्धिजीवियों और उत्साही लोगों के लिए इन विषयों का पता लगाने और चर्चा करने के लिए एक मंच के रूप में काम करना है।इसकी स्थापना 1980 के दशक की शुरुआत में हुई थी।प्रज्ञा प्रवाह विभिन्न राज्य स्तरीय संगठनों के माध्यम से काम करता है।जिसके प्रत्येक राज्य में अलग-अलग नाम हैं। उत्तराखंड मे यह “देवभूमि विचार मंच”के नाम से संगठित है।

उक्त बैठक को क्षेत्रिय प्रवास पर देहरादून पहुचे प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे नंद कुमार द्वारा सम्बोधिय किया गया। देवभूमि विचारमंच के कार्यकर्ताओं के साथ परिचर्चा करते हुए नंदकुमार ने भारतीय इतिहास के सत्य के साथ हुई प्रायोजित तथ्यात्मक साजिशों औऱ उसके प्रस्तुतिकरण से संदर्भित विषय पर विचार प्रस्तुत किये गये ।

जे नंद कुमार ने बताया कि वामपंथी इतिहासकारों द्वारा शैक्षणिक पुस्तकों में प्रस्तुत जानकारियों में मुग़ल आक्रताओं एवं उनके शासनकाल के कालखंड को भारत के वास्तविक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करने के कार्य किया और सत्य घटनाओं को कपोल कल्पित करार दिया, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब से लेकर अनेक वामपंथी इतिहास लिखको  ने कभी भी भारत के वैदिक राष्ट्रीय चिंतन को महत्व नहीं दिया, इसी कारण दो हजार वर्ष से अधिक समय तक रही दक्षिण भारत की चोल राजशाही इनकी किताबों मे इतिहास का हिस्सा नहीं बन पायी। वामपंथी इतिहासकारों  द्वारा भारत की संस्कृति को भृष्ट करने के उद्देश्य से भारत के इतिहास को हासिये पर रखते हुए मुग़ल इतिहास को प्रमुखता के साथ प्रदर्शित करने का कार्य किया।

यही कारण है कि इतिहास से लेकर भारत कि स्वतंत्रता आंदोलन मे अनेक ऐसे महापुरुष एवं स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी वाम इतिहास के अँधेरे मे खो गये। असम के योद्धा लाचित बोरफुकन के शासनकाल में मुग़ल शासक कभी भी पुर्वोत्तर कर राज्यों में अपना शासन स्थापित नहीं कर सके थे उन्हें हर युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था लेकिन वाम इतिहास लेखकों की पुस्तकों में कभी लाचित बोरफुकन  का नाम पढ़ने को नहीं मिला,उनके लिये लिये भारत का राष्ट्रीय चिंतन मात्र राजनितिक राष्ट्र विचार रहा,

 जबकि यह भारत का वैदिक विचार है जो हमारे वेद से निकल कर आया है अब समय आ गया है की देश के युवा भारत के इतिहास के सत्य को जाने औऱ उस दिशा में शोध एवं अध्ययन करें।

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