सवालों के घरे में डॉक्टर्स के ट्रांसफर और शासन में बैठे चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारी

उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विभाग में ट्रांसफर पर सवाल

Kuldeep Singh Rana /Dehradun /01-07-2026

त्तराखंड सरकार द्वारा 30 जून की शाम को चिकित्सा शिक्षा विभाग के 37 डॉक्टरों के स्थानांतरण आदेश जारी किए गये है जिसके बाद विभागीय गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुछ नामों के शामिल होने पर हैरानी जताई जा रही है, जबकि स्थानांतरण नीति के अनुसार जिन चिकित्सकों के तबादले अपेक्षित माने जा रहे थे, उनके नाम सूची से गायब होने पर असंतोष भी सामने आ रहा है।

लग रहें है लेन देन के आरोप
विभाग के भीतर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि बिना प्रभाव और लेन-देन के ऐसी सूची तैयार होना संभव नहीं है।
उत्तराखंड में स्थानांतरण प्रक्रिया को पारदर्शी और नियमबद्ध बनाने के लिए उत्तराखंड स्थानांतरण अधिनियम, 2017 लागू है। सामान्य परिस्थितियों में स्थानांतरण की अंतिम तिथि 10 जून निर्धारित है, जिसे इस वर्ष 30 जून तक बढ़ाया गया था। ऐसे में अपेक्षा थी कि जारी आदेश अधिनियम और शासनादेशों के अनुरूप पूरी तरह स्पष्ट और विधिसम्मत होगा।

सवालों के घेरे में जारी ट्रांसफर आदेश
लेकिन जारी आदेश कई सवाल खड़े हो रहें है। आदेश के शीर्ष पर “देहरादून, दिनांक–30 जून 2025” अंकित है। क्या यह मात्र टंकण त्रुटि है? इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश में उत्तराखंड स्थानांतरण अधिनियम, 2017 की उस धारा का उल्लेख नहीं है जिसके तहत स्थानांतरण किए गए हैं। इतना ही नहीं, 15 अप्रैल 2025 के कार्मिक विभाग के शासनादेश का भी कोई संदर्भ इसमें नहीं दिया गया है।


दिलचस्प तथ्य यह भी है कि 10 जून 2025 को चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा जारी पिछले स्थानांतरण आदेश में संबंधित अधिनियम की धारा और कार्मिक विभाग के शासनादेश का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। ऐसे में वर्तमान आदेश में इनका अभाव कई सवाल खड़े करता है।

विगत वर्ष प्रिंसिपलों की डीपीसी और स्थानांतरण आदेश भी रह चुका है विवादों में
यह पहला अवसर भी नहीं है जब चिकित्सा शिक्षा विभाग के स्थानांतरण आदेश विवादों में आए हों। इससे पहले मेडिकल कॉलेजों में स्थायी प्रिंसिपलों की डीपीसी और स्थानांतरण से सबंधित पहले आदेश पर भी गंभीर विवाद हुआ था। जिस पर तत्कालीन सचिव को स्पष्टीकरण देना पड़ा और आदेश पर रोक लगानी पड़ी थी बाद में पदोन्नति तथा स्थानांतरण के अलग-अलग आदेश जारी किये गये।


इसलिए विभागीय जानकार मौजूदा मामले को केवल लिपिकीय त्रुटि मानने को तैयार नहीं हैं।
कानूनी जानकारों का कहना है कि स्थानांतरण सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि शासन का विधिवत आदेश होती है। यदि उसमें आवश्यक वैधानिक आधार और संबंधित शासनादेशों का उल्लेख नहीं है, तो उसे न्यायालय में चुनौती दिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह सब महज मानवीय भूल है, या फिर किसी सुनियोजित व्यवस्था का हिस्सा? क्या आदेश में दिखाई दे रही कमियां भविष्य में किसी कानूनी चुनौती की स्थिति में कुछ लोगों के लिए सुरक्षा कवच का काम करेंगी? या फिर यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है?

वर्षो से एक ही स्थान पर जमे कई ऐसे चिकित्सकों को रखा गया है सूची से बाहर
विभाग के भीतर यह चर्चा भी है कि वर्षो से एक ही स्थान पर जमे कई ऐसे चिकित्सकों को सूची से बाहर रखा गया है जिनके स्थानांतरण नियमों के अनुसार अधिक आवश्यक बताए जा रहे थे। इनके ऊपर स्थानांतरण रुकवाने के लिए सत्ता और शासन के प्रभावशाली लोगों से निकट संबंध बनाए रखने के आरोप लगते रहें हैं।
चिकित्सा शिक्षा के गालियारों में यह भी चर्चा है कि वर्षों एक ही स्थान पर कुंडली जमाये बैठे इन लोगों ने अपने हितों को साधने के लिये सत्ता से लेकर शासन तक के गालियारों में नेताओं और अधिकारियों को सोने की चेन तक गिफ्ट करतें रहते है और जेबें नोटों से गर्म करके रखते है। जिसके दम पर यह लोग अपनी ट्रांसफर रुकवाने से लेकर अन्य विभाग में नियुक्त स्वजनों की चिकित्सा शिक्षा में सविलियन और समायोजन कराने की कोशिश करते है इसी प्रकार का एक प्रकारण कुछ समय पूर्व राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में भी काफी चर्चाओं में आया था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम का दुरूपयोग
चर्चा यह भी है कि इस बार की स्थानांतरण सूची से फिर कुछ ऐसे नाम को बाहर रखा गया हैं, जो स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सक्रिय कार्यकर्ता और पदाधिकारी बताते हैं। विभाग के भीतर कुछ लोगों का आरोप है कि संगठन के नाम और प्रभाव का उपयोग कर यह लोगों चिकित्सा शिक्षा में मनमानी करतें रहतें है और वर्षों से एक ही स्थान कुंडली मारे बैठे है।
विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मूल विचारधारा राष्ट्रसेवा और जनसेवा पर आधारित मानी जाती है तथा उसके स्वयंसेवक कठिन परिस्थितियों और दुर्गम क्षेत्रों में भी सेवा कार्य करते हैं,वहींयह लोग केवल अपने निजी हितों के लिए संगठन के नाम का उपयोग कर संघ की छवि को भी दूषित करने का कार्य करते रहें हैं।
उधर, तबादला सत्र के अंतिम दिन देर शाम जारी इस सूची को लेकर शासन में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा से जुड़े अधिकारी दावा कर रहे हैं कि सभी स्थानांतरण उत्तराखंड स्थानांतरण अधिनियम की सुसंगत धाराओं के अनुरूप किए गए है।
हालांकि, जारी आदेश में अधिनियम की संबंधित धाराओं, कार्मिक विभाग के शासनादेश के उल्लेख से सबंधित आवश्यक वैधानिक आधारों का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया गया है?

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